भगवद्गीता · अध्याय 17, श्लोक 20 · श्रीकृष्ण
भगवद्गीता 17.20 · दातव्यमिति यद्दानं
दातव्यमिति यद्दानं दीयतेऽनुपकारिणे ।
देशे काले च पात्रे च तद्दानं सात्त्विकं स्मृतम् ॥
dātavyamiti yaddānaṃ dīyate’nupakāriṇe |
deśe kāle ca pātre ca taddānaṃ sāttvikaṃ smṛtam ||
हिन्दी अनुवाद
जो दान केवल यह मानकर दिया जाता है कि देना कर्तव्य है, ऐसे व्यक्ति को जिससे बदले में कुछ अपेक्षा न हो, और उचित स्थान, समय और पात्र देखकर दिया जाता है — वह दान सात्त्विक माना गया है।
प्रसंग
यह श्लोक श्रीकृष्ण ने अध्याय 17, श्रद्धात्रयविभागयोग (श्रद्धात्रय विभाग योग) में कहा है। इस अध्याय में 28 श्लोक हैं।
अक्सर पूछे जाने वाले प्रश्न
भगवद्गीता 17.20 का अर्थ क्या है?
जो दान केवल यह मानकर दिया जाता है कि देना कर्तव्य है, ऐसे व्यक्ति को जिससे बदले में कुछ अपेक्षा न हो, और उचित स्थान, समय और पात्र देखकर दिया जाता है — वह दान सात्त्विक माना गया है।
भगवद्गीता 17.20 किसने कहा है?
यह श्लोक श्रीकृष्ण ने अर्जुन से अध्याय 17, श्रद्धात्रयविभागयोग (श्रद्धात्रय विभाग योग) में कहा है।
संस्कृत पाठ पारंपरिक है और सार्वजनिक डोमेन में है। हिन्दी अनुवाद हमारा अपना है।