भगवद्गीता · अध्याय 17, श्लोक 17 · श्रीकृष्ण

भगवद्गीता 17.17 · श्रद्धया परया तप्तं नरैः

श्रद्धया परया तप्तं तपस्तत्त्रिविधं नरैः ।
अफलाकाङ्क्षिभिर्युक्तैः सात्त्विकं परिचक्षते ॥

śraddhayā parayā taptaṃ tapastattrividhaṃ naraiḥ |
aphalākāṅkṣibhiryuktaiḥ sāttvikaṃ paricakṣate ||

हिन्दी अनुवाद

फल की इच्छा न रखने वाले, एकाग्र मनुष्यों द्वारा परम श्रद्धा से किया गया यह तीन प्रकार का तप सात्त्विक कहलाता है।

प्रसंग

यह श्लोक श्रीकृष्ण ने अध्याय 17, श्रद्धात्रयविभागयोग (श्रद्धात्रय विभाग योग) में कहा है। इस अध्याय में 28 श्लोक हैं।

अक्सर पूछे जाने वाले प्रश्न

भगवद्गीता 17.17 का अर्थ क्या है?

फल की इच्छा न रखने वाले, एकाग्र मनुष्यों द्वारा परम श्रद्धा से किया गया यह तीन प्रकार का तप सात्त्विक कहलाता है।

भगवद्गीता 17.17 किसने कहा है?

यह श्लोक श्रीकृष्ण ने अर्जुन से अध्याय 17, श्रद्धात्रयविभागयोग (श्रद्धात्रय विभाग योग) में कहा है।

संस्कृत पाठ पारंपरिक है और सार्वजनिक डोमेन में है। हिन्दी अनुवाद हमारा अपना है।