भगवद्गीता · अध्याय 17, श्लोक 16 · श्रीकृष्ण
भगवद्गीता 17.16 · मनः प्रसादः सौम्यत्वं
मनः प्रसादः सौम्यत्वं मौनमात्मविनिग्रहः ।
भावसंशुद्धिरित्येतत्तपो मानसमुच्यते ॥
manaḥ prasādaḥ saumyatvaṃ maunamātmavinigrahaḥ |
bhāvasaṃśuddhirityetattapo mānasamucyate ||
हिन्दी अनुवाद
मन की प्रसन्नता, सौम्यता, मौन, आत्म-संयम और भावों की शुद्धि — यह मन का तप कहलाता है।
प्रसंग
यह श्लोक श्रीकृष्ण ने अध्याय 17, श्रद्धात्रयविभागयोग (श्रद्धात्रय विभाग योग) में कहा है। इस अध्याय में 28 श्लोक हैं।
अक्सर पूछे जाने वाले प्रश्न
भगवद्गीता 17.16 का अर्थ क्या है?
मन की प्रसन्नता, सौम्यता, मौन, आत्म-संयम और भावों की शुद्धि — यह मन का तप कहलाता है।
भगवद्गीता 17.16 किसने कहा है?
यह श्लोक श्रीकृष्ण ने अर्जुन से अध्याय 17, श्रद्धात्रयविभागयोग (श्रद्धात्रय विभाग योग) में कहा है।
संस्कृत पाठ पारंपरिक है और सार्वजनिक डोमेन में है। हिन्दी अनुवाद हमारा अपना है।