भगवद्गीता · अध्याय 15, श्लोक 18 · श्रीकृष्ण

भगवद्गीता 15.18 · यस्मात्क्षरमतीतोऽहमक्षरादपि

यस्मात्क्षरमतीतोऽहमक्षरादपि चोत्तमः ।
अतोऽस्मि लोके वेदे च प्रथितः पुरुषोत्तमः ॥

yasmātkṣaramatīto’hamakṣarādapi cottamaḥ |
ato’smi loke vede ca prathitaḥ puruṣottamaḥ ||

हिन्दी अनुवाद

क्योंकि मैं क्षर से परे हूँ और अक्षर से भी उत्तम हूँ, इसलिए संसार में और वेद में पुरुषोत्तम के नाम से प्रसिद्ध हूँ।

प्रसंग

यह श्लोक श्रीकृष्ण ने अध्याय 15, पुरुषोत्तमयोग (पुरुषोत्तम योग) में कहा है। इस अध्याय में 20 श्लोक हैं।

अक्सर पूछे जाने वाले प्रश्न

भगवद्गीता 15.18 का अर्थ क्या है?

क्योंकि मैं क्षर से परे हूँ और अक्षर से भी उत्तम हूँ, इसलिए संसार में और वेद में पुरुषोत्तम के नाम से प्रसिद्ध हूँ।

भगवद्गीता 15.18 किसने कहा है?

यह श्लोक श्रीकृष्ण ने अर्जुन से अध्याय 15, पुरुषोत्तमयोग (पुरुषोत्तम योग) में कहा है।

संस्कृत पाठ पारंपरिक है और सार्वजनिक डोमेन में है। हिन्दी अनुवाद हमारा अपना है।