भगवद्गीता · अध्याय 15, श्लोक 17 · श्रीकृष्ण
भगवद्गीता 15.17 · उत्तमः पुरुषस्त्वन्यः
उत्तमः पुरुषस्त्वन्यः परमात्मेत्युदाहृतः ।
यो लोकत्रयमाविश्य बिभर्त्यव्यय ईश्वरः ॥
uttamaḥ puruṣastvanyaḥ paramātmetyudāhṛtaḥ |
yo lokatrayamāviśya bibhartyavyaya īśvaraḥ ||
हिन्दी अनुवाद
पर उत्तम पुरुष तो इनसे भिन्न है, जिसे परमात्मा कहा जाता है; वह अविनाशी ईश्वर तीनों लोकों में प्रवेश करके उनका पालन करता है।
प्रसंग
यह श्लोक श्रीकृष्ण ने अध्याय 15, पुरुषोत्तमयोग (पुरुषोत्तम योग) में कहा है। इस अध्याय में 20 श्लोक हैं।
अक्सर पूछे जाने वाले प्रश्न
भगवद्गीता 15.17 का अर्थ क्या है?
पर उत्तम पुरुष तो इनसे भिन्न है, जिसे परमात्मा कहा जाता है; वह अविनाशी ईश्वर तीनों लोकों में प्रवेश करके उनका पालन करता है।
भगवद्गीता 15.17 किसने कहा है?
यह श्लोक श्रीकृष्ण ने अर्जुन से अध्याय 15, पुरुषोत्तमयोग (पुरुषोत्तम योग) में कहा है।
संस्कृत पाठ पारंपरिक है और सार्वजनिक डोमेन में है। हिन्दी अनुवाद हमारा अपना है।