भगवद्गीता · अध्याय 14, श्लोक 25 · श्रीकृष्ण
भगवद्गीता 14.25 · मानापमानयोस्तुल्यस्तुल्यो
मानापमानयोस्तुल्यस्तुल्यो मित्रारिपक्षयोः ।
सर्वारम्भपरित्यागी गुणातीतः स उच्यते ॥
mānāpamānayostulyastulyo mitrāripakṣayoḥ |
sarvārambhaparityāgī guṇātītaḥ sa ucyate ||
हिन्दी अनुवाद
— जो मान और अपमान में समान है, मित्र और शत्रु के प्रति समान है, और जिसने अपने लिए किए जाने वाले सारे आरम्भ छोड़ दिए हैं — वही गुणातीत कहलाता है।
प्रसंग
यह श्लोक श्रीकृष्ण ने अध्याय 14, गुणत्रयविभागयोग (गुणत्रय विभाग योग) में कहा है। इस अध्याय में 27 श्लोक हैं।
अक्सर पूछे जाने वाले प्रश्न
भगवद्गीता 14.25 का अर्थ क्या है?
— जो मान और अपमान में समान है, मित्र और शत्रु के प्रति समान है, और जिसने अपने लिए किए जाने वाले सारे आरम्भ छोड़ दिए हैं — वही गुणातीत कहलाता है।
भगवद्गीता 14.25 किसने कहा है?
यह श्लोक श्रीकृष्ण ने अर्जुन से अध्याय 14, गुणत्रयविभागयोग (गुणत्रय विभाग योग) में कहा है।
संस्कृत पाठ पारंपरिक है और सार्वजनिक डोमेन में है। हिन्दी अनुवाद हमारा अपना है।