भगवद्गीता · अध्याय 14, श्लोक 24 · श्रीकृष्ण

भगवद्गीता 14.24 · समदुःखसुखः स्वस्थः

समदुःखसुखः स्वस्थः समलोष्टाश्मकाञ्चनः ।
तुल्यप्रियाप्रियो धीरस्तुल्यनिन्दात्मसंस्तुतिः ॥

samaduḥkhasukhaḥ svasthaḥ samaloṣṭāśmakāñcanaḥ |
tulyapriyāpriyo dhīrastulyanindātmasaṃstutiḥ ||

हिन्दी अनुवाद

— जो सुख-दुःख में समान रहता है, अपने स्वरूप में स्थित है, मिट्टी के ढेले, पत्थर और सोने को एक-सा देखता है, प्रिय और अप्रिय में एक-सा रहता है, धीर है, और अपनी निन्दा तथा प्रशंसा को समान मानता है —

प्रसंग

यह श्लोक श्रीकृष्ण ने अध्याय 14, गुणत्रयविभागयोग (गुणत्रय विभाग योग) में कहा है। इस अध्याय में 27 श्लोक हैं।

अक्सर पूछे जाने वाले प्रश्न

भगवद्गीता 14.24 का अर्थ क्या है?

— जो सुख-दुःख में समान रहता है, अपने स्वरूप में स्थित है, मिट्टी के ढेले, पत्थर और सोने को एक-सा देखता है, प्रिय और अप्रिय में एक-सा रहता है, धीर है, और अपनी निन्दा तथा प्रशंसा को समान मानता है —

भगवद्गीता 14.24 किसने कहा है?

यह श्लोक श्रीकृष्ण ने अर्जुन से अध्याय 14, गुणत्रयविभागयोग (गुणत्रय विभाग योग) में कहा है।

संस्कृत पाठ पारंपरिक है और सार्वजनिक डोमेन में है। हिन्दी अनुवाद हमारा अपना है।