भगवद्गीता · अध्याय 14, श्लोक 2 · श्रीकृष्ण

भगवद्गीता 14.2 · इदं ज्ञानमुपाश्रित्य मम

इदं ज्ञानमुपाश्रित्य मम साधर्म्यमागताः ।
सर्गेऽपि नोपजायन्ते प्रलये न व्यथन्ति च ॥

idaṃ jñānamupāśritya mama sādharmyamāgatāḥ |
sarge’pi nopajāyante pralaye na vyathanti ca ||

हिन्दी अनुवाद

इस ज्ञान का आश्रय लेकर जो मेरे स्वरूप के समान हो गए हैं, वे न सृष्टि के आरम्भ में जन्म लेते हैं और न प्रलय के समय व्याकुल होते हैं।

प्रसंग

यह श्लोक श्रीकृष्ण ने अध्याय 14, गुणत्रयविभागयोग (गुणत्रय विभाग योग) में कहा है। इस अध्याय में 27 श्लोक हैं।

अक्सर पूछे जाने वाले प्रश्न

भगवद्गीता 14.2 का अर्थ क्या है?

इस ज्ञान का आश्रय लेकर जो मेरे स्वरूप के समान हो गए हैं, वे न सृष्टि के आरम्भ में जन्म लेते हैं और न प्रलय के समय व्याकुल होते हैं।

भगवद्गीता 14.2 किसने कहा है?

यह श्लोक श्रीकृष्ण ने अर्जुन से अध्याय 14, गुणत्रयविभागयोग (गुणत्रय विभाग योग) में कहा है।

संस्कृत पाठ पारंपरिक है और सार्वजनिक डोमेन में है। हिन्दी अनुवाद हमारा अपना है।