भगवद्गीता · अध्याय 13, श्लोक 12 · श्रीकृष्ण
भगवद्गीता 13.12 · ज्ञेयं
ज्ञेयं यत्तत्प्रवक्ष्यामि यज्ज्ञात्वामृतमश्नुते ।
अनादि मत्परं ब्रह्म न सत्तन्नासदुच्यते ॥
jñeyaṃ yattatpravakṣyāmi yajjñātvāmṛtamaśnute |
anādi matparaṃ brahma na sattannāsaducyate ||
हिन्दी अनुवाद
अब मैं वह बताऊँगा जो जानने योग्य है, जिसे जानकर मनुष्य अमरता पाता है। वह अनादि परम ब्रह्म है, जिसे न सत् कहा जा सकता है, न असत्।
प्रसंग
यह श्लोक श्रीकृष्ण ने अध्याय 13, क्षेत्रक्षेत्रज्ञविभागयोग (क्षेत्र-क्षेत्रज्ञ विभाग योग) में कहा है। इस अध्याय में 34 श्लोक हैं।
अक्सर पूछे जाने वाले प्रश्न
भगवद्गीता 13.12 का अर्थ क्या है?
अब मैं वह बताऊँगा जो जानने योग्य है, जिसे जानकर मनुष्य अमरता पाता है। वह अनादि परम ब्रह्म है, जिसे न सत् कहा जा सकता है, न असत्।
भगवद्गीता 13.12 किसने कहा है?
यह श्लोक श्रीकृष्ण ने अर्जुन से अध्याय 13, क्षेत्रक्षेत्रज्ञविभागयोग (क्षेत्र-क्षेत्रज्ञ विभाग योग) में कहा है।
संस्कृत पाठ पारंपरिक है और सार्वजनिक डोमेन में है। हिन्दी अनुवाद हमारा अपना है।