भगवद्गीता · अध्याय 12, श्लोक 6 · श्रीकृष्ण

भगवद्गीता 12.6 · ये तु सर्वाणि कर्माणि

ये तु सर्वाणि कर्माणि मयि संन्यस्य मत्पराः ।
अनन्येनैव योगेन मां ध्यायन्त उपासते ॥

ye tu sarvāṇi karmāṇi mayi saṃnyasya matparāḥ |
ananyenaiva yogena māṃ dhyāyanta upāsate ||

हिन्दी अनुवाद

परन्तु जो अपने सारे कर्म मुझे अर्पित करके, मुझे ही परम लक्ष्य मानकर, अनन्य भक्ति-योग से मेरा ध्यान करते हुए मेरी उपासना करते हैं —

प्रसंग

यह श्लोक श्रीकृष्ण ने अध्याय 12, भक्तियोग (भक्ति योग) में कहा है। इस अध्याय में 20 श्लोक हैं।

अक्सर पूछे जाने वाले प्रश्न

भगवद्गीता 12.6 का अर्थ क्या है?

परन्तु जो अपने सारे कर्म मुझे अर्पित करके, मुझे ही परम लक्ष्य मानकर, अनन्य भक्ति-योग से मेरा ध्यान करते हुए मेरी उपासना करते हैं —

भगवद्गीता 12.6 किसने कहा है?

यह श्लोक श्रीकृष्ण ने अर्जुन से अध्याय 12, भक्तियोग (भक्ति योग) में कहा है।

संस्कृत पाठ पारंपरिक है और सार्वजनिक डोमेन में है। हिन्दी अनुवाद हमारा अपना है।