भगवद्गीता · अध्याय 12, श्लोक 18 · श्रीकृष्ण
भगवद्गीता 12.18 · समः शत्रौ च मित्रे च तथा
समः शत्रौ च मित्रे च तथा मानापमानयोः ।
शीतोष्णसुखदुःखेषु समः सङ्गविवर्जितः ॥
samaḥ śatrau ca mitre ca tathā mānāpamānayoḥ |
śītoṣṇasukhaduḥkheṣu samaḥ saṅgavivarjitaḥ ||
हिन्दी अनुवाद
जो शत्रु और मित्र के प्रति, मान और अपमान में, सर्दी और गर्मी में, सुख और दुःख में समान रहता है, और जो आसक्ति से मुक्त है —
प्रसंग
यह श्लोक श्रीकृष्ण ने अध्याय 12, भक्तियोग (भक्ति योग) में कहा है। इस अध्याय में 20 श्लोक हैं।
अक्सर पूछे जाने वाले प्रश्न
भगवद्गीता 12.18 का अर्थ क्या है?
जो शत्रु और मित्र के प्रति, मान और अपमान में, सर्दी और गर्मी में, सुख और दुःख में समान रहता है, और जो आसक्ति से मुक्त है —
भगवद्गीता 12.18 किसने कहा है?
यह श्लोक श्रीकृष्ण ने अर्जुन से अध्याय 12, भक्तियोग (भक्ति योग) में कहा है।
संस्कृत पाठ पारंपरिक है और सार्वजनिक डोमेन में है। हिन्दी अनुवाद हमारा अपना है।