भगवद्गीता · अध्याय 12, श्लोक 15 · श्रीकृष्ण
भगवद्गीता 12.15 · यस्मान्नोद्विजते लोको च
यस्मान्नोद्विजते लोको लोकान्नोद्विजते च यः ।
हर्षामर्षभयोद्वेगैर्मुक्तो यः स च मे प्रियः ॥
yasmānnodvijate loko lokānnodvijate ca yaḥ |
harṣāmarṣabhayodvegairmukto yaḥ sa ca me priyaḥ ||
हिन्दी अनुवाद
जिससे संसार को कोई उद्वेग नहीं होता और जो स्वयं संसार से उद्विग्न नहीं होता; जो हर्ष, अधीरता, भय और व्याकुलता से मुक्त है — वह मुझे प्रिय है।
प्रसंग
यह श्लोक श्रीकृष्ण ने अध्याय 12, भक्तियोग (भक्ति योग) में कहा है। इस अध्याय में 20 श्लोक हैं।
अक्सर पूछे जाने वाले प्रश्न
भगवद्गीता 12.15 का अर्थ क्या है?
जिससे संसार को कोई उद्वेग नहीं होता और जो स्वयं संसार से उद्विग्न नहीं होता; जो हर्ष, अधीरता, भय और व्याकुलता से मुक्त है — वह मुझे प्रिय है।
भगवद्गीता 12.15 किसने कहा है?
यह श्लोक श्रीकृष्ण ने अर्जुन से अध्याय 12, भक्तियोग (भक्ति योग) में कहा है।
संस्कृत पाठ पारंपरिक है और सार्वजनिक डोमेन में है। हिन्दी अनुवाद हमारा अपना है।