भगवद्गीता · अध्याय 11, श्लोक 45 · अर्जुन
भगवद्गीता 11.45 · अदृष्टपूर्वं हृषितोऽस्मि
अदृष्टपूर्वं हृषितोऽस्मि दृष्ट्वा
भयेन च प्रव्यथितं मनो मे ।
तदेव मे दर्शय देव रूपं
प्रसीद देवेश जगन्निवास ॥
adṛṣṭapūrvaṃ hṛṣito’smi dṛṣṭvā
bhayena ca pravyathitaṃ mano me |
tadeva me darśaya deva rūpaṃ
prasīda deveśa jagannivāsa ||
हिन्दी अनुवाद
जो पहले कभी नहीं देखा था, उसे देखकर मैं हर्षित हूँ, पर मेरा मन भय से व्याकुल भी है। हे देव, मुझे अपना वही दूसरा रूप दिखाइए; हे देवेश, हे जगन्निवास, प्रसन्न होइए।
प्रसंग
यह श्लोक अर्जुन ने अध्याय 11, विश्वरूपदर्शनयोग (विश्वरूप दर्शन योग) में कहा है। इस अध्याय में 55 श्लोक हैं।
अक्सर पूछे जाने वाले प्रश्न
भगवद्गीता 11.45 का अर्थ क्या है?
जो पहले कभी नहीं देखा था, उसे देखकर मैं हर्षित हूँ, पर मेरा मन भय से व्याकुल भी है। हे देव, मुझे अपना वही दूसरा रूप दिखाइए; हे देवेश, हे जगन्निवास, प्रसन्न होइए।
भगवद्गीता 11.45 किसने कहा है?
यह श्लोक अर्जुन ने अध्याय 11, विश्वरूपदर्शनयोग (विश्वरूप दर्शन योग) में कहा है।
संस्कृत पाठ पारंपरिक है और सार्वजनिक डोमेन में है। हिन्दी अनुवाद हमारा अपना है।