भगवद्गीता · अध्याय 11, श्लोक 43 · अर्जुन
भगवद्गीता 11.43 · पितासि लोकस्य चराचरस्य
पितासि लोकस्य चराचरस्य
त्वमस्य पूज्यश्च गुरुर्गरीयान् ।
न त्वत्समोऽस्त्यभ्यधिकः कुतोऽन्यो
लोकत्रयेऽप्यप्रतिमप्रभाव ॥
pitāsi lokasya carācarasya
tvamasya pūjyaśca gururgarīyān |
na tvatsamo’styabhyadhikaḥ kuto’nyo
lokatraye’pyapratimaprabhāva ||
हिन्दी अनुवाद
आप इस चर-अचर जगत के पिता हैं, इसके पूज्य और सबसे श्रेष्ठ गुरु हैं। हे अतुलनीय प्रभाव वाले, तीनों लोकों में आपके समान भी कोई नहीं, तो आपसे बढ़कर कोई कैसे हो सकता है?
प्रसंग
यह श्लोक अर्जुन ने अध्याय 11, विश्वरूपदर्शनयोग (विश्वरूप दर्शन योग) में कहा है। इस अध्याय में 55 श्लोक हैं।
अक्सर पूछे जाने वाले प्रश्न
भगवद्गीता 11.43 का अर्थ क्या है?
आप इस चर-अचर जगत के पिता हैं, इसके पूज्य और सबसे श्रेष्ठ गुरु हैं। हे अतुलनीय प्रभाव वाले, तीनों लोकों में आपके समान भी कोई नहीं, तो आपसे बढ़कर कोई कैसे हो सकता है?
भगवद्गीता 11.43 किसने कहा है?
यह श्लोक अर्जुन ने अध्याय 11, विश्वरूपदर्शनयोग (विश्वरूप दर्शन योग) में कहा है।
संस्कृत पाठ पारंपरिक है और सार्वजनिक डोमेन में है। हिन्दी अनुवाद हमारा अपना है।