भगवद्गीता · अध्याय 11, श्लोक 42 · अर्जुन
भगवद्गीता 11.42 · यच्चावहासार्थमसत्कृतोऽसि
यच्चावहासार्थमसत्कृतोऽसि
विहारशय्यासनभोजनेषु ।
एकोऽथवाप्यच्युत तत्समक्षं
तत्क्षामये त्वामहमप्रमेयम् ॥
yaccāvahāsārthamasatkṛto’si
vihāraśayyāsanabhojaneṣu |
eko’thavāpyacyuta tatsamakṣaṃ
tatkṣāmaye tvāmahamaprameyam ||
हिन्दी अनुवाद
— और हे अच्युत, हँसी-मज़ाक में, खेलते, लेटते, बैठते या भोजन करते समय, अकेले में या दूसरों के सामने मुझसे आपका जो भी अनादर हुआ हो — उस सबके लिए मैं आप अपरिमेय से क्षमा माँगता हूँ।
प्रसंग
यह श्लोक अर्जुन ने अध्याय 11, विश्वरूपदर्शनयोग (विश्वरूप दर्शन योग) में कहा है। इस अध्याय में 55 श्लोक हैं।
अक्सर पूछे जाने वाले प्रश्न
भगवद्गीता 11.42 का अर्थ क्या है?
— और हे अच्युत, हँसी-मज़ाक में, खेलते, लेटते, बैठते या भोजन करते समय, अकेले में या दूसरों के सामने मुझसे आपका जो भी अनादर हुआ हो — उस सबके लिए मैं आप अपरिमेय से क्षमा माँगता हूँ।
भगवद्गीता 11.42 किसने कहा है?
यह श्लोक अर्जुन ने अध्याय 11, विश्वरूपदर्शनयोग (विश्वरूप दर्शन योग) में कहा है।
संस्कृत पाठ पारंपरिक है और सार्वजनिक डोमेन में है। हिन्दी अनुवाद हमारा अपना है।