भगवद्गीता · अध्याय 10, श्लोक 9 · श्रीकृष्ण

भगवद्गीता 10.9 · मच्चित्ता मद्गतप्राणा

मच्चित्ता मद्गतप्राणा बोधयन्तः परस्परम् ।
कथयन्तश्च मां नित्यं तुष्यन्ति च रमन्ति च ॥

maccittā madgataprāṇā bodhayantaḥ parasparam |
kathayantaśca māṃ nityaṃ tuṣyanti ca ramanti ca ||

हिन्दी अनुवाद

उनका चित्त मुझमें लगा रहता है, उनका जीवन मुझे समर्पित रहता है; वे एक-दूसरे को मेरा बोध कराते हुए और सदा मेरी ही चर्चा करते हुए सन्तुष्ट और आनन्दित रहते हैं।

प्रसंग

यह श्लोक श्रीकृष्ण ने अध्याय 10, विभूतियोग (विभूति योग) में कहा है। इस अध्याय में 42 श्लोक हैं।

अक्सर पूछे जाने वाले प्रश्न

भगवद्गीता 10.9 का अर्थ क्या है?

उनका चित्त मुझमें लगा रहता है, उनका जीवन मुझे समर्पित रहता है; वे एक-दूसरे को मेरा बोध कराते हुए और सदा मेरी ही चर्चा करते हुए सन्तुष्ट और आनन्दित रहते हैं।

भगवद्गीता 10.9 किसने कहा है?

यह श्लोक श्रीकृष्ण ने अर्जुन से अध्याय 10, विभूतियोग (विभूति योग) में कहा है।

संस्कृत पाठ पारंपरिक है और सार्वजनिक डोमेन में है। हिन्दी अनुवाद हमारा अपना है।