भगवद्गीता · अध्याय 10, श्लोक 8 · श्रीकृष्ण
भगवद्गीता 10.8 · अहं सर्वस्य प्रभवो मत्तः
अहं सर्वस्य प्रभवो मत्तः सर्वं प्रवर्तते ।
इति मत्वा भजन्ते मां बुधा भावसमन्विताः ॥
ahaṃ sarvasya prabhavo mattaḥ sarvaṃ pravartate |
iti matvā bhajante māṃ budhā bhāvasamanvitāḥ ||
हिन्दी अनुवाद
मैं ही सबका मूल हूँ; मुझसे ही सब कुछ प्रवृत्त होता है। यह समझकर ज्ञानी लोग प्रेम-भाव से भरकर मेरा भजन करते हैं।
प्रसंग
यह श्लोक श्रीकृष्ण ने अध्याय 10, विभूतियोग (विभूति योग) में कहा है। इस अध्याय में 42 श्लोक हैं।
अक्सर पूछे जाने वाले प्रश्न
भगवद्गीता 10.8 का अर्थ क्या है?
मैं ही सबका मूल हूँ; मुझसे ही सब कुछ प्रवृत्त होता है। यह समझकर ज्ञानी लोग प्रेम-भाव से भरकर मेरा भजन करते हैं।
भगवद्गीता 10.8 किसने कहा है?
यह श्लोक श्रीकृष्ण ने अर्जुन से अध्याय 10, विभूतियोग (विभूति योग) में कहा है।
संस्कृत पाठ पारंपरिक है और सार्वजनिक डोमेन में है। हिन्दी अनुवाद हमारा अपना है।