भगवद्गीता · अध्याय 10, श्लोक 5 · श्रीकृष्ण
भगवद्गीता 10.5 · अहिंसा समता तुष्टिस्तपो
अहिंसा समता तुष्टिस्तपो दानं यशोऽयशः ।
भवन्ति भावा भूतानां मत्त एव पृथग्विधाः ॥
ahiṃsā samatā tuṣṭistapo dānaṃ yaśo’yaśaḥ |
bhavanti bhāvā bhūtānāṃ matta eva pṛthagvidhāḥ ||
हिन्दी अनुवाद
— अहिंसा, समता, सन्तोष, तप, दान, यश और अपयश — प्राणियों के ये विविध भाव मुझसे ही उत्पन्न होते हैं।
प्रसंग
यह श्लोक श्रीकृष्ण ने अध्याय 10, विभूतियोग (विभूति योग) में कहा है। इस अध्याय में 42 श्लोक हैं।
अक्सर पूछे जाने वाले प्रश्न
भगवद्गीता 10.5 का अर्थ क्या है?
— अहिंसा, समता, सन्तोष, तप, दान, यश और अपयश — प्राणियों के ये विविध भाव मुझसे ही उत्पन्न होते हैं।
भगवद्गीता 10.5 किसने कहा है?
यह श्लोक श्रीकृष्ण ने अर्जुन से अध्याय 10, विभूतियोग (विभूति योग) में कहा है।
संस्कृत पाठ पारंपरिक है और सार्वजनिक डोमेन में है। हिन्दी अनुवाद हमारा अपना है।