भगवद्गीता · अध्याय 10, श्लोक 4 · श्रीकृष्ण

भगवद्गीता 10.4 · बुद्धिर्ज्ञानमसंमोहः दमः

बुद्धिर्ज्ञानमसंमोहः क्षमा सत्यं दमः शमः ।
सुखं दुःखं भवोऽभावो भयं चाभयमेव च ॥

buddhirjñānamasaṃmohaḥ kṣamā satyaṃ damaḥ śamaḥ |
sukhaṃ duḥkhaṃ bhavo’bhāvo bhayaṃ cābhayameva ca ||

हिन्दी अनुवाद

बुद्धि, ज्ञान, मन की स्पष्टता, क्षमा, सत्य, इन्द्रिय-संयम, मन की शान्ति; सुख और दुःख, उत्पत्ति और विनाश, भय और अभय —

प्रसंग

यह श्लोक श्रीकृष्ण ने अध्याय 10, विभूतियोग (विभूति योग) में कहा है। इस अध्याय में 42 श्लोक हैं।

अक्सर पूछे जाने वाले प्रश्न

भगवद्गीता 10.4 का अर्थ क्या है?

बुद्धि, ज्ञान, मन की स्पष्टता, क्षमा, सत्य, इन्द्रिय-संयम, मन की शान्ति; सुख और दुःख, उत्पत्ति और विनाश, भय और अभय —

भगवद्गीता 10.4 किसने कहा है?

यह श्लोक श्रीकृष्ण ने अर्जुन से अध्याय 10, विभूतियोग (विभूति योग) में कहा है।

संस्कृत पाठ पारंपरिक है और सार्वजनिक डोमेन में है। हिन्दी अनुवाद हमारा अपना है।