भगवद्गीता · अध्याय 10, श्लोक 15 · अर्जुन
भगवद्गीता 10.15 · स्वयमेवात्मनात्मानं त्वं
स्वयमेवात्मनात्मानं वेत्थ त्वं पुरुषोत्तम ।
भूतभावन भूतेश देवदेव जगत्पते ॥
svayamevātmanātmānaṃ vettha tvaṃ puruṣottama |
bhūtabhāvana bhūteśa devadeva jagatpate ||
हिन्दी अनुवाद
हे पुरुषोत्तम, हे प्राणियों के उत्पत्तिकर्ता, हे प्राणियों के स्वामी, हे देवों के देव, हे जगत के अधिपति — आप स्वयं ही अपने-आप को अपने द्वारा जानते हैं।
प्रसंग
यह श्लोक अर्जुन ने अध्याय 10, विभूतियोग (विभूति योग) में कहा है। इस अध्याय में 42 श्लोक हैं।
अक्सर पूछे जाने वाले प्रश्न
भगवद्गीता 10.15 का अर्थ क्या है?
हे पुरुषोत्तम, हे प्राणियों के उत्पत्तिकर्ता, हे प्राणियों के स्वामी, हे देवों के देव, हे जगत के अधिपति — आप स्वयं ही अपने-आप को अपने द्वारा जानते हैं।
भगवद्गीता 10.15 किसने कहा है?
यह श्लोक अर्जुन ने अध्याय 10, विभूतियोग (विभूति योग) में कहा है।
संस्कृत पाठ पारंपरिक है और सार्वजनिक डोमेन में है। हिन्दी अनुवाद हमारा अपना है।