भगवद्गीता · अध्याय 1, श्लोक 38 · अर्जुन

भगवद्गीता 1.38 · यद्यप्येते न पश्यन्ति

यद्यप्येते न पश्यन्ति लोभोपहतचेतसः ।
कुलक्षयकृतं दोषं मित्रद्रोहे च पातकम् ॥

yadyapyete na paśyanti lobhopahatacetasaḥ |
kulakṣayakṛtaṃ doṣaṃ mitradrohe ca pātakam ||

हिन्दी अनुवाद

यद्यपि लोभ से विवेक खो चुके ये लोग कुल के नाश से होने वाले दोष और मित्रों से विश्वासघात के पाप को नहीं देखते, —

प्रसंग

यह श्लोक अर्जुन ने अध्याय 1, अर्जुनविषादयोग (अर्जुन का विषाद) में कहा है। इस अध्याय में 47 श्लोक हैं।

अक्सर पूछे जाने वाले प्रश्न

भगवद्गीता 1.38 का अर्थ क्या है?

यद्यपि लोभ से विवेक खो चुके ये लोग कुल के नाश से होने वाले दोष और मित्रों से विश्वासघात के पाप को नहीं देखते, —

भगवद्गीता 1.38 किसने कहा है?

यह श्लोक अर्जुन ने अध्याय 1, अर्जुनविषादयोग (अर्जुन का विषाद) में कहा है।

संस्कृत पाठ पारंपरिक है और सार्वजनिक डोमेन में है। हिन्दी अनुवाद हमारा अपना है।