भगवद्गीता · अध्याय 1, श्लोक 18 · संजय

भगवद्गीता 1.18 · द्रुपदो द्रौपदेयाश्च

द्रुपदो द्रौपदेयाश्च सर्वशः पृथिवीपते ।
सौभद्रश्च महाबाहुः शङ्खान्दध्मुः पृथक्पृथक् ॥

drupado draupadeyāśca sarvaśaḥ pṛthivīpate |
saubhadraśca mahābāhuḥ śaṅkhāndadhmuḥ pṛthakpṛthak ||

हिन्दी अनुवाद

— द्रुपद, द्रौपदी के पुत्र और महाबाहु अभिमन्यु — हे पृथ्वीपति, इन सबने चारों ओर से अपने-अपने शंख अलग-अलग बजाए।

प्रसंग

यह श्लोक संजय ने अध्याय 1, अर्जुनविषादयोग (अर्जुन का विषाद) में कहा है। इस अध्याय में 47 श्लोक हैं।

अक्सर पूछे जाने वाले प्रश्न

भगवद्गीता 1.18 का अर्थ क्या है?

— द्रुपद, द्रौपदी के पुत्र और महाबाहु अभिमन्यु — हे पृथ्वीपति, इन सबने चारों ओर से अपने-अपने शंख अलग-अलग बजाए।

भगवद्गीता 1.18 किसने कहा है?

यह श्लोक संजय ने अध्याय 1, अर्जुनविषादयोग (अर्जुन का विषाद) में कहा है।

संस्कृत पाठ पारंपरिक है और सार्वजनिक डोमेन में है। हिन्दी अनुवाद हमारा अपना है।