आरती · लक्ष्मी

लक्ष्मी आरती — ओम जय लक्ष्मी माता

“ओम जय लक्ष्मी माता” दीवाली की लक्ष्मी पूजा और शुक्रवार को गाई जाने वाली आरती है। इसमें माँ लक्ष्मी की स्तुति जगत की माता के रूप में की गई है, जो क्षीरसागर से प्रकट हुईं, और जिनके बिना न समृद्धि संभव है, न सद्गुण, न यज्ञ।

देवतालक्ष्मी
रचनाकारपारंपरिक
भाषाहिन्दी
पद8

कब पढ़ें: दीवाली की लक्ष्मी पूजा में, धनतेरस, शरद पूर्णिमा और शुक्रवार को, तथा लक्ष्मी पूजन के अंत में गाई जाती है।

आरती

  1. ॐ जय लक्ष्मी माता, मैया जय लक्ष्मी माता ।
    तुमको निशदिन सेवत, हरि विष्णु विधाता ॥

    oṃ jay lakṣmī mātā, maiyā jay lakṣmī mātā |
    tumko niśadin sevat, hari viṣṇu vidhātā ||

    माँ लक्ष्मी की जय हो! हरि विष्णु और सृष्टिकर्ता ब्रह्मा दिन-रात आपकी सेवा करते हैं।

  2. उमा रमा ब्रह्माणी, तुम ही जग-माता ।
    सूर्य-चन्द्रमा ध्यावत, नारद ऋषि गाता ॥

    umā ramā brahmāṇī, tum hī jag-mātā |
    sūrya-candramā dhyāvat, nārad ṛṣi gātā ||

    आप ही उमा, रमा और ब्रह्माणी हैं, आप ही जगत की माता हैं; सूर्य और चंद्रमा आपका ध्यान करते हैं और नारद ऋषि आपका गुणगान करते हैं।

  3. दुर्गा रूप निरंजनी, सुख सम्पत्ति दाता ।
    जो कोई तुमको ध्यावत, ऋद्धि-सिद्धि धन पाता ॥

    durgā rūp niraṃjanī, sukh sampatti dātā |
    jo koī tumko dhyāvat, ṛddhi-siddhi dhan pātā ||

    हे निर्मल माँ, आप दुर्गा रूप में सुख और संपत्ति देने वाली हैं; जो कोई आपका ध्यान करता है, उसे ऋद्धि-सिद्धि और धन प्राप्त होता है।

  4. तुम पाताल-निवासिनि, तुम ही शुभदाता ।
    कर्म-प्रभाव-प्रकाशिनी, भवनिधि की त्राता ॥

    tum pātāl-nivāsini, tum hī śubhdātā |
    karma-prabhāv-prakāśinī, bhavanidhi kī trātā ||

    आप पाताल में भी निवास करती हैं और आप ही शुभ फल देने वाली हैं; आप कर्मों के प्रभाव को प्रकट करती हैं और संसार-सागर से पार उतारती हैं।

  5. जिस घर में तुम रहतीं, सब सद्गुण आता ।
    सब सम्भव हो जाता, मन नहीं घबराता ॥

    jis ghar meṃ tum rahtīṃ, sab sadguṇ ātā |
    sab sambhav ho jātā, man nahīṃ ghabrātā ||

    जिस घर में आप रहती हैं, वहाँ सब सद्गुण आ जाते हैं; सब कुछ संभव हो जाता है और मन नहीं घबराता।

  6. तुम बिन यज्ञ न होते, वस्त्र न कोई पाता ।
    खान-पान का वैभव, सब तुमसे आता ॥

    tum bin yajña na hote, vastra na koī pātā |
    khān-pān kā vaibhav, sab tumse ātā ||

    आपके बिना न यज्ञ हो सकते हैं, न किसी को वस्त्र मिलते हैं; खाने-पीने का सारा वैभव आपसे ही आता है।

  7. शुभ-गुण मन्दिर सुन्दर, क्षीरोदधि-जाता ।
    रत्न चतुर्दश तुम बिन, कोई नहीं पाता ॥

    śubh-guṇ mandir sundar, kṣīrodadhi-jātā |
    ratna caturdaś tum bin, koī nahīṃ pātā ||

    आप शुभ गुणों का सुंदर मंदिर हैं और क्षीरसागर से प्रकट हुई हैं; आपके बिना कोई चौदह रत्न नहीं पा सकता।

  8. महालक्ष्मीजी की आरती, जो कोई नर गाता ।
    उर आनन्द समाता, पाप उतर जाता ॥

    mahālakṣmījī kī ārtī, jo koī nar gātā |
    ur ānanda samātā, pāp utar jātā ||

    जो कोई महालक्ष्मी जी की यह आरती गाता है, उसका हृदय आनंद से भर जाता है और उसके पाप उतर जाते हैं।

पाठ गिनती

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देवनागरी पाठ पारंपरिक है और सार्वजनिक डोमेन में है; हिन्दी अर्थ हमारा अपना है। अलग-अलग संस्करणों और गायकों के पाठ में थोड़ा अंतर हो सकता है।

अक्सर पूछे जाने वाले प्रश्न

लक्ष्मी आरती — ओम जय लक्ष्मी माता की रचना किसने की?

लक्ष्मी आरती — ओम जय लक्ष्मी माता एक पारंपरिक रचना है, जो हिन्दी में है।

लक्ष्मी आरती — ओम जय लक्ष्मी माता का पाठ कब करना चाहिए?

दीवाली की लक्ष्मी पूजा में, धनतेरस, शरद पूर्णिमा और शुक्रवार को, तथा लक्ष्मी पूजन के अंत में गाई जाती है।

लक्ष्मी आरती — ओम जय लक्ष्मी माता किस बारे में है?

“ओम जय लक्ष्मी माता” दीवाली की लक्ष्मी पूजा और शुक्रवार को गाई जाने वाली आरती है। इसमें माँ लक्ष्मी की स्तुति जगत की माता के रूप में की गई है, जो क्षीरसागर से प्रकट हुईं, और जिनके बिना न समृद्धि संभव है, न सद्गुण, न यज्ञ।