भगवद्गीता · अध्याय 9, श्लोक 33 · श्रीकृष्ण

भगवद्गीता 9.33 · किं पुनर्ब्राह्मणाः

किं पुनर्ब्राह्मणाः पुण्या भक्ता राजर्षयस्तथा ।
अनित्यमसुखं लोकमिमं प्राप्य भजस्व माम् ॥

kiṃ punarbrāhmaṇāḥ puṇyā bhaktā rājarṣayastathā |
anityamasukhaṃ lokamimaṃ prāpya bhajasva mām ||

हिन्दी अनुवाद

फिर पुण्यात्मा ब्राह्मणों और भक्त राजर्षियों की तो बात ही क्या! इसलिए इस क्षणभंगुर और सुखरहित संसार में आकर तुम मेरी भक्ति करो।

प्रसंग

यह श्लोक श्रीकृष्ण ने अध्याय 9, राजविद्याराजगुह्ययोग (राजविद्या राजगुह्य योग) में कहा है। इस अध्याय में 34 श्लोक हैं।

अक्सर पूछे जाने वाले प्रश्न

भगवद्गीता 9.33 का अर्थ क्या है?

फिर पुण्यात्मा ब्राह्मणों और भक्त राजर्षियों की तो बात ही क्या! इसलिए इस क्षणभंगुर और सुखरहित संसार में आकर तुम मेरी भक्ति करो।

भगवद्गीता 9.33 किसने कहा है?

यह श्लोक श्रीकृष्ण ने अर्जुन से अध्याय 9, राजविद्याराजगुह्ययोग (राजविद्या राजगुह्य योग) में कहा है।

संस्कृत पाठ पारंपरिक है और सार्वजनिक डोमेन में है। हिन्दी अनुवाद हमारा अपना है।