भगवद्गीता · अध्याय 9, श्लोक 31 · श्रीकृष्ण

भगवद्गीता 9.31 · क्षिप्रं भवति धर्मात्मा

क्षिप्रं भवति धर्मात्मा शश्वच्छान्तिं निगच्छति ।
कौन्तेय प्रति जानीहि न मे भक्तः प्रणश्यति ॥

kṣipraṃ bhavati dharmātmā śaśvacchāntiṃ nigacchati |
kaunteya prati jānīhi na me bhaktaḥ praṇaśyati ||

हिन्दी अनुवाद

वह शीघ्र ही धर्मात्मा बन जाता है और स्थायी शान्ति पाता है। हे कुन्तीपुत्र, निश्चित रूप से जान लो कि मेरा भक्त कभी नष्ट नहीं होता।

प्रसंग

यह श्लोक श्रीकृष्ण ने अध्याय 9, राजविद्याराजगुह्ययोग (राजविद्या राजगुह्य योग) में कहा है। इस अध्याय में 34 श्लोक हैं।

अक्सर पूछे जाने वाले प्रश्न

भगवद्गीता 9.31 का अर्थ क्या है?

वह शीघ्र ही धर्मात्मा बन जाता है और स्थायी शान्ति पाता है। हे कुन्तीपुत्र, निश्चित रूप से जान लो कि मेरा भक्त कभी नष्ट नहीं होता।

भगवद्गीता 9.31 किसने कहा है?

यह श्लोक श्रीकृष्ण ने अर्जुन से अध्याय 9, राजविद्याराजगुह्ययोग (राजविद्या राजगुह्य योग) में कहा है।

संस्कृत पाठ पारंपरिक है और सार्वजनिक डोमेन में है। हिन्दी अनुवाद हमारा अपना है।