भगवद्गीता · अध्याय 9, श्लोक 29 · श्रीकृष्ण
भगवद्गीता 9.29 · समोऽहं सर्वभूतेषु न मे न
समोऽहं सर्वभूतेषु न मे द्वेष्योऽस्ति न प्रियः ।
ये भजन्ति तु मां भक्त्या मयि ते तेषु चाप्यहम् ॥
samo’haṃ sarvabhūteṣu na me dveṣyo’sti na priyaḥ |
ye bhajanti tu māṃ bhaktyā mayi te teṣu cāpyaham ||
हिन्दी अनुवाद
मैं सब प्राणियों के प्रति समान हूँ; न कोई मुझे अप्रिय है, न कोई विशेष प्रिय। पर जो भक्ति से मेरा भजन करते हैं, वे मुझमें हैं और मैं भी उनमें हूँ।
प्रसंग
यह श्लोक श्रीकृष्ण ने अध्याय 9, राजविद्याराजगुह्ययोग (राजविद्या राजगुह्य योग) में कहा है। इस अध्याय में 34 श्लोक हैं।
अक्सर पूछे जाने वाले प्रश्न
भगवद्गीता 9.29 का अर्थ क्या है?
मैं सब प्राणियों के प्रति समान हूँ; न कोई मुझे अप्रिय है, न कोई विशेष प्रिय। पर जो भक्ति से मेरा भजन करते हैं, वे मुझमें हैं और मैं भी उनमें हूँ।
भगवद्गीता 9.29 किसने कहा है?
यह श्लोक श्रीकृष्ण ने अर्जुन से अध्याय 9, राजविद्याराजगुह्ययोग (राजविद्या राजगुह्य योग) में कहा है।
संस्कृत पाठ पारंपरिक है और सार्वजनिक डोमेन में है। हिन्दी अनुवाद हमारा अपना है।