भगवद्गीता · अध्याय 9, श्लोक 16 · श्रीकृष्ण
भगवद्गीता 9.16 · अहं क्रतुरहं यज्ञः
अहं क्रतुरहं यज्ञः स्वधाहमहमौषधम् ।
मन्त्रोऽहमहमेवाज्यमहमग्निरहं हुतम् ॥
ahaṃ kraturahaṃ yajñaḥ svadhāhamahamauṣadham |
mantro’hamahamevājyamahamagnirahaṃ hutam ||
हिन्दी अनुवाद
मैं ही क्रतु (वैदिक अनुष्ठान) हूँ, मैं ही यज्ञ हूँ, मैं ही पितरों को दी जाने वाली स्वधा हूँ, मैं ही औषधि हूँ; मैं ही मन्त्र हूँ, मैं ही घी हूँ, मैं ही अग्नि हूँ और मैं ही आहुति का कर्म हूँ।
प्रसंग
यह श्लोक श्रीकृष्ण ने अध्याय 9, राजविद्याराजगुह्ययोग (राजविद्या राजगुह्य योग) में कहा है। इस अध्याय में 34 श्लोक हैं।
अक्सर पूछे जाने वाले प्रश्न
भगवद्गीता 9.16 का अर्थ क्या है?
मैं ही क्रतु (वैदिक अनुष्ठान) हूँ, मैं ही यज्ञ हूँ, मैं ही पितरों को दी जाने वाली स्वधा हूँ, मैं ही औषधि हूँ; मैं ही मन्त्र हूँ, मैं ही घी हूँ, मैं ही अग्नि हूँ और मैं ही आहुति का कर्म हूँ।
भगवद्गीता 9.16 किसने कहा है?
यह श्लोक श्रीकृष्ण ने अर्जुन से अध्याय 9, राजविद्याराजगुह्ययोग (राजविद्या राजगुह्य योग) में कहा है।
संस्कृत पाठ पारंपरिक है और सार्वजनिक डोमेन में है। हिन्दी अनुवाद हमारा अपना है।