भगवद्गीता · अध्याय 5, श्लोक 4 · श्रीकृष्ण

भगवद्गीता 5.4 · सांख्ययोगौ पृथग्बालाः न

सांख्ययोगौ पृथग्बालाः प्रवदन्ति न पण्डिताः ।
एकमप्यास्थितः सम्यगुभयोर्विन्दते फलम् ॥

sāṃkhyayogau pṛthagbālāḥ pravadanti na paṇḍitāḥ |
ekamapyāsthitaḥ samyagubhayorvindate phalam ||

हिन्दी अनुवाद

सांख्य और योग को नासमझ लोग अलग-अलग बताते हैं, ज्ञानी नहीं। इनमें से किसी एक में भी भली-भाँति स्थित व्यक्ति दोनों का फल पा लेता है।

प्रसंग

यह श्लोक श्रीकृष्ण ने अध्याय 5, कर्मसंन्यासयोग (कर्म-संन्यास योग) में कहा है। इस अध्याय में 29 श्लोक हैं।

अक्सर पूछे जाने वाले प्रश्न

भगवद्गीता 5.4 का अर्थ क्या है?

सांख्य और योग को नासमझ लोग अलग-अलग बताते हैं, ज्ञानी नहीं। इनमें से किसी एक में भी भली-भाँति स्थित व्यक्ति दोनों का फल पा लेता है।

भगवद्गीता 5.4 किसने कहा है?

यह श्लोक श्रीकृष्ण ने अर्जुन से अध्याय 5, कर्मसंन्यासयोग (कर्म-संन्यास योग) में कहा है।

संस्कृत पाठ पारंपरिक है और सार्वजनिक डोमेन में है। हिन्दी अनुवाद हमारा अपना है।