भगवद्गीता · अध्याय 5, श्लोक 22 · श्रीकृष्ण
भगवद्गीता 5.22 · ये हि संस्पर्शजा भोगा एव
ये हि संस्पर्शजा भोगा दुःखयोनय एव ते ।
आद्यन्तवन्तः कौन्तेय न तेषु रमते बुधः ॥
ye hi saṃsparśajā bhogā duḥkhayonaya eva te |
ādyantavantaḥ kaunteya na teṣu ramate budhaḥ ||
हिन्दी अनुवाद
हे कुन्तीपुत्र, इन्द्रियों के विषयों के संपर्क से मिलने वाले भोग वास्तव में दुःख के ही स्रोत हैं; उनका आदि भी है और अंत भी। ज्ञानी उनमें नहीं रमता।
प्रसंग
यह श्लोक श्रीकृष्ण ने अध्याय 5, कर्मसंन्यासयोग (कर्म-संन्यास योग) में कहा है। इस अध्याय में 29 श्लोक हैं।
अक्सर पूछे जाने वाले प्रश्न
भगवद्गीता 5.22 का अर्थ क्या है?
हे कुन्तीपुत्र, इन्द्रियों के विषयों के संपर्क से मिलने वाले भोग वास्तव में दुःख के ही स्रोत हैं; उनका आदि भी है और अंत भी। ज्ञानी उनमें नहीं रमता।
भगवद्गीता 5.22 किसने कहा है?
यह श्लोक श्रीकृष्ण ने अर्जुन से अध्याय 5, कर्मसंन्यासयोग (कर्म-संन्यास योग) में कहा है।
संस्कृत पाठ पारंपरिक है और सार्वजनिक डोमेन में है। हिन्दी अनुवाद हमारा अपना है।