भगवद्गीता · अध्याय 17, श्लोक 25 · श्रीकृष्ण
भगवद्गीता 17.25 · तदित्यनभिसन्धाय फलं
तदित्यनभिसन्धाय फलं यज्ञतपःक्रियाः ।
दानक्रियाश्च विविधाः क्रियन्ते मोक्षकाङ्क्षिभिः ॥
tadityanabhisandhāya phalaṃ yajñatapaḥkriyāḥ |
dānakriyāśca vividhāḥ kriyante mokṣakāṅkṣibhiḥ ||
हिन्दी अनुवाद
मोक्ष चाहने वाले लोग “तत्” का उच्चारण करके, फल की इच्छा छोड़कर, यज्ञ, तप और दान के विभिन्न कर्म करते हैं।
प्रसंग
यह श्लोक श्रीकृष्ण ने अध्याय 17, श्रद्धात्रयविभागयोग (श्रद्धात्रय विभाग योग) में कहा है। इस अध्याय में 28 श्लोक हैं।
अक्सर पूछे जाने वाले प्रश्न
भगवद्गीता 17.25 का अर्थ क्या है?
मोक्ष चाहने वाले लोग “तत्” का उच्चारण करके, फल की इच्छा छोड़कर, यज्ञ, तप और दान के विभिन्न कर्म करते हैं।
भगवद्गीता 17.25 किसने कहा है?
यह श्लोक श्रीकृष्ण ने अर्जुन से अध्याय 17, श्रद्धात्रयविभागयोग (श्रद्धात्रय विभाग योग) में कहा है।
संस्कृत पाठ पारंपरिक है और सार्वजनिक डोमेन में है। हिन्दी अनुवाद हमारा अपना है।