भगवद्गीता · अध्याय 17, श्लोक 14 · श्रीकृष्ण

भगवद्गीता 17.14 · देवद्विजगुरुप्राज्ञपूजनं

देवद्विजगुरुप्राज्ञपूजनं शौचमार्जवम् ।
ब्रह्मचर्यमहिंसा च शारीरं तप उच्यते ॥

devadvijaguruprājñapūjanaṃ śaucamārjavam |
brahmacaryamahiṃsā ca śārīraṃ tapa ucyate ||

हिन्दी अनुवाद

देवता, द्विज, गुरु और ज्ञानी जनों का आदर, पवित्रता, सरलता, ब्रह्मचर्य और अहिंसा — यह शरीर का तप कहलाता है।

प्रसंग

यह श्लोक श्रीकृष्ण ने अध्याय 17, श्रद्धात्रयविभागयोग (श्रद्धात्रय विभाग योग) में कहा है। इस अध्याय में 28 श्लोक हैं।

अक्सर पूछे जाने वाले प्रश्न

भगवद्गीता 17.14 का अर्थ क्या है?

देवता, द्विज, गुरु और ज्ञानी जनों का आदर, पवित्रता, सरलता, ब्रह्मचर्य और अहिंसा — यह शरीर का तप कहलाता है।

भगवद्गीता 17.14 किसने कहा है?

यह श्लोक श्रीकृष्ण ने अर्जुन से अध्याय 17, श्रद्धात्रयविभागयोग (श्रद्धात्रय विभाग योग) में कहा है।

संस्कृत पाठ पारंपरिक है और सार्वजनिक डोमेन में है। हिन्दी अनुवाद हमारा अपना है।