भगवद्गीता · अध्याय 17, श्लोक 11 · श्रीकृष्ण

भगवद्गीता 17.11 · अफलाकाङ्क्षिभिर्यज्ञो य

अफलाकाङ्क्षिभिर्यज्ञो विधिदृष्टो य इज्यते ।
यष्टव्यमेवेति मनः समाधाय स सात्त्विकः ॥

aphalākāṅkṣibhiryajño vidhidṛṣṭo ya ijyate |
yaṣṭavyameveti manaḥ samādhāya sa sāttvikaḥ ||

हिन्दी अनुवाद

जो यज्ञ फल की इच्छा न रखने वाले लोग शास्त्र-विधि के अनुसार, मन में यह निश्चय करके करते हैं कि इसे करना ही कर्तव्य है, वह सात्त्विक है।

प्रसंग

यह श्लोक श्रीकृष्ण ने अध्याय 17, श्रद्धात्रयविभागयोग (श्रद्धात्रय विभाग योग) में कहा है। इस अध्याय में 28 श्लोक हैं।

अक्सर पूछे जाने वाले प्रश्न

भगवद्गीता 17.11 का अर्थ क्या है?

जो यज्ञ फल की इच्छा न रखने वाले लोग शास्त्र-विधि के अनुसार, मन में यह निश्चय करके करते हैं कि इसे करना ही कर्तव्य है, वह सात्त्विक है।

भगवद्गीता 17.11 किसने कहा है?

यह श्लोक श्रीकृष्ण ने अर्जुन से अध्याय 17, श्रद्धात्रयविभागयोग (श्रद्धात्रय विभाग योग) में कहा है।

संस्कृत पाठ पारंपरिक है और सार्वजनिक डोमेन में है। हिन्दी अनुवाद हमारा अपना है।