भगवद्गीता · अध्याय 15, श्लोक 9 · श्रीकृष्ण

भगवद्गीता 15.9 · श्रोत्रं चक्षुः स्पर्शनं

श्रोत्रं चक्षुः स्पर्शनं च रसनं घ्राणमेव च ।
अधिष्ठाय मनश्चायं विषयानुपसेवते ॥

śrotraṃ cakṣuḥ sparśanaṃ ca rasanaṃ ghrāṇameva ca |
adhiṣṭhāya manaścāyaṃ viṣayānupasevate ||

हिन्दी अनुवाद

कान, आँख, त्वचा, जीभ और नाक, तथा मन का आश्रय लेकर वह विषयों का अनुभव करता है।

प्रसंग

यह श्लोक श्रीकृष्ण ने अध्याय 15, पुरुषोत्तमयोग (पुरुषोत्तम योग) में कहा है। इस अध्याय में 20 श्लोक हैं।

अक्सर पूछे जाने वाले प्रश्न

भगवद्गीता 15.9 का अर्थ क्या है?

कान, आँख, त्वचा, जीभ और नाक, तथा मन का आश्रय लेकर वह विषयों का अनुभव करता है।

भगवद्गीता 15.9 किसने कहा है?

यह श्लोक श्रीकृष्ण ने अर्जुन से अध्याय 15, पुरुषोत्तमयोग (पुरुषोत्तम योग) में कहा है।

संस्कृत पाठ पारंपरिक है और सार्वजनिक डोमेन में है। हिन्दी अनुवाद हमारा अपना है।