भगवद्गीता · अध्याय 15, श्लोक 11 · श्रीकृष्ण

भगवद्गीता 15.11 · यतन्तो योगिनश्चैनं

यतन्तो योगिनश्चैनं पश्यन्त्यात्मन्यवस्थितम् ।
यतन्तोऽप्यकृतात्मानो नैनं पश्यन्त्यचेतसः ॥

yatanto yoginaścainaṃ paśyantyātmanyavasthitam |
yatanto’pyakṛtātmāno nainaṃ paśyantyacetasaḥ ||

हिन्दी अनुवाद

प्रयत्न करने वाले योगी उसे अपने भीतर स्थित देखते हैं; पर जिनका अन्तःकरण शुद्ध नहीं हुआ और जिनमें विवेक नहीं है, वे प्रयत्न करके भी उसे नहीं देख पाते।

प्रसंग

यह श्लोक श्रीकृष्ण ने अध्याय 15, पुरुषोत्तमयोग (पुरुषोत्तम योग) में कहा है। इस अध्याय में 20 श्लोक हैं।

अक्सर पूछे जाने वाले प्रश्न

भगवद्गीता 15.11 का अर्थ क्या है?

प्रयत्न करने वाले योगी उसे अपने भीतर स्थित देखते हैं; पर जिनका अन्तःकरण शुद्ध नहीं हुआ और जिनमें विवेक नहीं है, वे प्रयत्न करके भी उसे नहीं देख पाते।

भगवद्गीता 15.11 किसने कहा है?

यह श्लोक श्रीकृष्ण ने अर्जुन से अध्याय 15, पुरुषोत्तमयोग (पुरुषोत्तम योग) में कहा है।

संस्कृत पाठ पारंपरिक है और सार्वजनिक डोमेन में है। हिन्दी अनुवाद हमारा अपना है।