भगवद्गीता · अध्याय 14, श्लोक 27 · श्रीकृष्ण

भगवद्गीता 14.27 · ब्रह्मणो हि च

ब्रह्मणो हि प्रतिष्ठाहममृतस्याव्ययस्य च ।
शाश्वतस्य च धर्मस्य सुखस्यैकान्तिकस्य च ॥

brahmaṇo hi pratiṣṭhāhamamṛtasyāvyayasya ca |
śāśvatasya ca dharmasya sukhasyaikāntikasya ca ||

हिन्दी अनुवाद

क्योंकि अविनाशी और अमृत ब्रह्म का, सनातन धर्म का और परम आनन्द का आधार मैं ही हूँ।

प्रसंग

यह श्लोक श्रीकृष्ण ने अध्याय 14, गुणत्रयविभागयोग (गुणत्रय विभाग योग) में कहा है। इस अध्याय में 27 श्लोक हैं।

अक्सर पूछे जाने वाले प्रश्न

भगवद्गीता 14.27 का अर्थ क्या है?

क्योंकि अविनाशी और अमृत ब्रह्म का, सनातन धर्म का और परम आनन्द का आधार मैं ही हूँ।

भगवद्गीता 14.27 किसने कहा है?

यह श्लोक श्रीकृष्ण ने अर्जुन से अध्याय 14, गुणत्रयविभागयोग (गुणत्रय विभाग योग) में कहा है।

संस्कृत पाठ पारंपरिक है और सार्वजनिक डोमेन में है। हिन्दी अनुवाद हमारा अपना है।