भगवद्गीता · अध्याय 13, श्लोक 32 · श्रीकृष्ण
भगवद्गीता 13.32 · यथा सर्वगतं नोपलिप्यते
यथा सर्वगतं सौक्ष्म्यादाकाशं नोपलिप्यते ।
सर्वत्रावस्थितो देहे तथात्मा नोपलिप्यते ॥
yathā sarvagataṃ saukṣmyādākāśaṃ nopalipyate |
sarvatrāvasthito dehe tathātmā nopalipyate ||
हिन्दी अनुवाद
जैसे सब ओर व्याप्त आकाश अपनी सूक्ष्मता के कारण किसी से लिप्त नहीं होता, वैसे ही पूरे शरीर में स्थित आत्मा भी लिप्त नहीं होती।
प्रसंग
यह श्लोक श्रीकृष्ण ने अध्याय 13, क्षेत्रक्षेत्रज्ञविभागयोग (क्षेत्र-क्षेत्रज्ञ विभाग योग) में कहा है। इस अध्याय में 34 श्लोक हैं।
अक्सर पूछे जाने वाले प्रश्न
भगवद्गीता 13.32 का अर्थ क्या है?
जैसे सब ओर व्याप्त आकाश अपनी सूक्ष्मता के कारण किसी से लिप्त नहीं होता, वैसे ही पूरे शरीर में स्थित आत्मा भी लिप्त नहीं होती।
भगवद्गीता 13.32 किसने कहा है?
यह श्लोक श्रीकृष्ण ने अर्जुन से अध्याय 13, क्षेत्रक्षेत्रज्ञविभागयोग (क्षेत्र-क्षेत्रज्ञ विभाग योग) में कहा है।
संस्कृत पाठ पारंपरिक है और सार्वजनिक डोमेन में है। हिन्दी अनुवाद हमारा अपना है।