भगवद्गीता · अध्याय 13, श्लोक 15 · श्रीकृष्ण

भगवद्गीता 13.15 · बहिरन्तश्च भूतानामचरं च

बहिरन्तश्च भूतानामचरं चरमेव च ।
सूक्ष्मत्वात्तदविज्ञेयं दूरस्थं चान्तिके च तत् ॥

bahirantaśca bhūtānāmacaraṃ carameva ca |
sūkṣmatvāttadavijñeyaṃ dūrasthaṃ cāntike ca tat ||

हिन्दी अनुवाद

वह सब प्राणियों के बाहर भी है और भीतर भी; अचल भी है और चल भी। सूक्ष्म होने के कारण वह जाना नहीं जाता; वह बहुत दूर भी है और अत्यन्त निकट भी।

प्रसंग

यह श्लोक श्रीकृष्ण ने अध्याय 13, क्षेत्रक्षेत्रज्ञविभागयोग (क्षेत्र-क्षेत्रज्ञ विभाग योग) में कहा है। इस अध्याय में 34 श्लोक हैं।

अक्सर पूछे जाने वाले प्रश्न

भगवद्गीता 13.15 का अर्थ क्या है?

वह सब प्राणियों के बाहर भी है और भीतर भी; अचल भी है और चल भी। सूक्ष्म होने के कारण वह जाना नहीं जाता; वह बहुत दूर भी है और अत्यन्त निकट भी।

भगवद्गीता 13.15 किसने कहा है?

यह श्लोक श्रीकृष्ण ने अर्जुन से अध्याय 13, क्षेत्रक्षेत्रज्ञविभागयोग (क्षेत्र-क्षेत्रज्ञ विभाग योग) में कहा है।

संस्कृत पाठ पारंपरिक है और सार्वजनिक डोमेन में है। हिन्दी अनुवाद हमारा अपना है।