भगवद्गीता · अध्याय 11, श्लोक 37 · अर्जुन
भगवद्गीता 11.37 · कस्माच्च ते न
कस्माच्च ते न नमेरन्महात्मन्
गरीयसे ब्रह्मणोऽप्यादिकर्त्रे ।
अनन्त देवेश जगन्निवास
त्वमक्षरं सदसत्तत्परं यत् ॥
kasmācca te na nameranmahātman
garīyase brahmaṇo’pyādikartre |
ananta deveśa jagannivāsa
tvamakṣaraṃ sadasattatparaṃ yat ||
हिन्दी अनुवाद
हे महात्मन, वे आपको नमस्कार क्यों न करें? आप तो आदि-स्रष्टा ब्रह्मा से भी बड़े हैं। हे अनन्त, हे देवेश, हे जगन्निवास, आप ही अक्षर हैं — सत् भी, असत् भी, और जो इन दोनों से परे है वह भी।
प्रसंग
यह श्लोक अर्जुन ने अध्याय 11, विश्वरूपदर्शनयोग (विश्वरूप दर्शन योग) में कहा है। इस अध्याय में 55 श्लोक हैं।
अक्सर पूछे जाने वाले प्रश्न
भगवद्गीता 11.37 का अर्थ क्या है?
हे महात्मन, वे आपको नमस्कार क्यों न करें? आप तो आदि-स्रष्टा ब्रह्मा से भी बड़े हैं। हे अनन्त, हे देवेश, हे जगन्निवास, आप ही अक्षर हैं — सत् भी, असत् भी, और जो इन दोनों से परे है वह भी।
भगवद्गीता 11.37 किसने कहा है?
यह श्लोक अर्जुन ने अध्याय 11, विश्वरूपदर्शनयोग (विश्वरूप दर्शन योग) में कहा है।
संस्कृत पाठ पारंपरिक है और सार्वजनिक डोमेन में है। हिन्दी अनुवाद हमारा अपना है।