भगवद्गीता · अध्याय 10, श्लोक 37 · श्रीकृष्ण
भगवद्गीता 10.37 · वृष्णीनां वासुदेवोऽस्मि
वृष्णीनां वासुदेवोऽस्मि पाण्डवानां धनंजयः ।
मुनीनामप्यहं व्यासः कवीनामुशना कविः ॥
vṛṣṇīnāṃ vāsudevo’smi pāṇḍavānāṃ dhanaṃjayaḥ |
munīnāmapyahaṃ vyāsaḥ kavīnāmuśanā kaviḥ ||
हिन्दी अनुवाद
वृष्णिवंशियों में मैं वासुदेव हूँ, पाण्डवों में धनञ्जय; मुनियों में मैं व्यास हूँ और कवियों में उशना कवि।
प्रसंग
यह श्लोक श्रीकृष्ण ने अध्याय 10, विभूतियोग (विभूति योग) में कहा है। इस अध्याय में 42 श्लोक हैं।
अक्सर पूछे जाने वाले प्रश्न
भगवद्गीता 10.37 का अर्थ क्या है?
वृष्णिवंशियों में मैं वासुदेव हूँ, पाण्डवों में धनञ्जय; मुनियों में मैं व्यास हूँ और कवियों में उशना कवि।
भगवद्गीता 10.37 किसने कहा है?
यह श्लोक श्रीकृष्ण ने अर्जुन से अध्याय 10, विभूतियोग (विभूति योग) में कहा है।
संस्कृत पाठ पारंपरिक है और सार्वजनिक डोमेन में है। हिन्दी अनुवाद हमारा अपना है।